विचार भूमि

पहले राष्ट्र..

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'अन्ना' के साथ - पथ मेरा मुझको दिखलादे....

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मुझको मेरी राह बतादे, पथ मेरा मुझको दिखलादे…
तू तो है सब ज्ञान का दाता, छिपा कोई कुछ तुझ से पाता !!!

तम का ऐसा राज चला है, सत्य राष्ट्र को छोड़ चला है…
झूठ यहाँ पर धर्म हुआ है, धर्म की खातिर खून हुआ है…

आज यहाँ चलता तो हो है, जो जितना बदनाम हुआ है…
इन्सां जो सच्चे ईमान का, वो तो बस बे-दाम हुआ है…

अरे !!! तूने ही इन्सान बनाये, और ज्ञान के दीप जलाये…
कर्म का ज्ञान दिया गीता में, धर्म की खातिर जग में आये…

आज राष्ट्र फिर मांग रहा है, आशा से वह देख रहा है..
एक चला “सिद्धि” से बढाकर, जीवन अपना झोक रहा है…

राष्ट्र, सत्य और त्याग के पग पर….
मेरे भी कुछ पग बढ़वा दे…मुझको मेरी राह बतादे…पथ मेरा मुझको दिखलादे…



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Santosh Kumar के द्वारा
August 14, 2011

प्रिय अरुणेश जी ,..बहुत सुंदर समसामयिक विनती ,… “देहि शिवा बर मोहि इहै -शुभ कर्मन तो कबहूँ ना डरो” सादर आभार

    Arunesh Mishra के द्वारा
    August 15, 2011

    धन्यवाद संतोष जी, शब्दों को लयबद्ध करने में थोडा कच्चा हूँ…लेकिन शायद भावनाए पंहुचा पाया होऊंगा…


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